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स्वामी विवेकानंद प्रेरक प्रसंग

स्वामी विवेकानंद(Swami Vivekanand) वह महानुभाव है जिन्होंने सात समंदर पार भारत की गोरवमय संस्कृति और धर्म की पताका फहराई। आइए जानते हैं कुछ ऐसे प्रेरक प्रसंग जो स्वामी विवेकानंद एक साथ हुए।




स्वामी विवेकानन्द के प्रेरक प्रसंग

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व्यक्ति की पहचान


एक बार की बात है जब स्वामी जी न्यूयॉर्क शहर में थे तब एक व्यक्ति ने स्वामी जी की अजीबो गरीब वेश भूषा पर एक तंज कस दिया।


और, कहने लग गया कि आप ऐसे गेरूए कपड़े क्यों पहनते हैं? इतने पढ़े-लिखे और हाई-फाई अंग्रेजी बोलने वाले सज्जन पुरुष पर भला क्या ये कपड़े शोभा देते हैं?


इस बात पर विवेकानंद जी ने बहुत ही सुंदर जवाब दिया। 


और, कहा कि तुम्हारे देश में जरूर वेशभूषा और सुंदर सुंदर कपड़ों से व्यक्ती की पहचान की जाती होगी, जिसके जितने तड़कते भड़कते, बढ़िया कपड़े वो व्यक्ति उतना आदर्श या सभ्यप्रिय होगा।


लेकिन, हमारे देश भारत में व्यक्ती की पहचान उसके कपड़ों से नहीं अपितु उसके चरित्र से होती है।


ये बात सुनकर न्यूयॉर्क वासी स्तब्ध रह गए और सभी स्वामी जी के नतमस्क हो गए।



स्वामी विवेकानन्द के प्रेरक प्रसंग

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लक्ष्य पर ध्यान लगाओ


अमेरिका में स्वामी जी भ्रमण कर रहे थे, ऐसे ही भ्रमण करते हुए स्वामी जी ने देखा कि कुछ लड़के पुल पर से नदी में पड़े अंडों के छिलकों पर अपनी बंदूक से निशाना लगा रहे थे।


लेकिन किसी का भी निशाना सटीक नहीं लग रहा था।


स्वामी जी उन लड़कों के पास जाते हैं और खुद उन अंडों के छिलकों पर निशाना साधते हैं और उनके बारह के बारह निशाने एक दम सटीक अंडों के छिलकों पर लगते हैं।


ये सब देखकर सारे लड़के हैरत भरी नजरों से स्वामी जी को देखते हैं और पूछते हैं ये कारनामा जो हम नहीं कर पाए भला आपने कैसे कर लिया। 

स्वामी जी कहते हैं मेरा ध्यान सिर्फ लक्ष्य के ऊपर था और कहीं ध्यान नहीं था इसलिए मेरे बारह निशाने सटीक लगे जबकि तुम्हारा पूरा ध्यान लक्ष्य की ओर नहीं था।


दोस्तों! हमें अपना सारा दिमाग एक लक्ष्य के प्रति ही लगाना चाहिए, हमारे साहस से बड़ी कोई चीज इस दुनिया में नहीं हैं। हम हर चीज मुकम्मल कर सकते हैं, बस जरुरत है तो ध्यान की, और लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण की।



स्वामी विवेकानन्द के प्रेरक प्रसंग

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सच बोलने की हिम्मत करो


स्वामी जी का मूल नाम नरेंद्र था। स्वामी जी अपने विद्यार्थी जीवन में मेधावी छात्र थे। 


जब कक्षा में स्वामी जी अपने सहपाठियों से बात करते थे या उन्हें कुछ समझाते थे तो सारे विद्यार्थी उनकी बातों ध्यान मग्न होकर सुना करते थे क्योंकि नरेंद्र की बातों में मधुरता और स्पष्टता होती थी।


ऐसा ही एक किस्सा है जब एक बार क्लास इंटरवल में नरेंद्र अपने दोस्तों को कुछ समझा रहे थे तो सारे विद्यार्थी नरेंद्र को बड़े ही ध्यान से सुन रहे थे। कब में को क्लास शुरू हो गई और कक्षा में गुरुजी पढ़ाने आ गए, किसी को कुछ पता ही नहीं चला।


क्लास में पढ़ाते समय गुरुजी को पीछे से कुछ फुसफुसाहट सी सुनाई दी और गुरु जी ने बच्चों से पूछा ये क्लास में कौन बातें कर रहा हैं? तो सभी विद्यार्थियों ने पीछे बैठे हुए बच्चों की तरफ इशारा कर दिया।


फिर क्या था, सभी बच्चों को गुरु जी ने आगे बुला लिया और पाठ में पढ़ाए गए कुछ सवाल जवाब करने लगे लेकिन कोई बच्चा गुरुजी के सवालों का जवाब नहीं दे पाया।


अंत में, गुरुजी ने नरेंद्र से भी सवाल पूछे तो नरेंद्र ने सारे उत्तर बता दिए।


गुरुजी ने नरेंद्र को छोड़कर सभी बच्चों को बैंच पर खड़ा कर दिया लेकिन नरेंद्र ने गुरुजी से कहा मुझे भी सजा मिलनी चाहिए क्योंकि मैं भी आपका पढ़ाया नहीं सुन रहा था।


गुरु जी नरेन्द्र को भी फिर बैंच पर खड़ा कर देते हैं।


दोस्तों! देखा आपने कैसे स्वामी जी ने अपने विद्यार्थी जीवन में ही सच बोलने की हिम्मत का आलौकिक गुण सीख लिया था इसी प्रकार हमें भी सच बोलने के गुण को खुद के भीतर आत्मसात करना चाहिए।



स्वामी विवेकानन्द के प्रेरक प्रसंग

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सफलता का रहस्य


एक बार की बात है स्वामी जी के पास एक व्यक्ति हताश और निराश अवस्था में आता है, और स्वामी जी को कहता हैं कि मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूं।


मैं अपने जीवन में मेहनत तो बहुत करता हूं लेकिन पता नहीं क्यों, मुझे सफलता नहीं मिलती हैं। पता नहीं क्यों भगवान ने मेरा ऐसा नसीब बनाया है।


मैं पढ़ा लिखा भी खूब हूं और मेहनती भी खूब हूं। अब आप ही बताइए स्वामी जी मैं क्या करूं जिससे कि मेरको सफलता प्राप्त हो जाए।


स्वामी जी आश्रम में बैठे हुए सारी बातें सुन रहे थे।


स्वामी जी ने कहा तुम एक काम करो फिलहाल इस कुत्ते को थोड़ा टहला लाओ। फिर मैं तुम्हें कुछ बताता हूं।


व्यक्ति सोच में पड़ जाता हैं भला! मैं स्वामी जी को अपनी समस्या बता रहा हूं और मुझे ये इसका समाधान बताने की जगह अपना कुत्ता टहलवाने के लिए कह रहे हैं। 


अब स्वामी जी की बात कौन टाल सकता था, तो वो व्यक्ति कुत्ते को टहलाने के लिए चला जाता हैं।


जब वो व्यक्ति कुत्ते को टहलाकर वापिस स्वामी जी के पास आता है तो स्वामी जी देखते हैं कि कुत्ता तो बहुत थक गया है जबकि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी खिला हुआ हैं।


स्वामी जी उस व्यक्ति से पूछते हैं कि ये कुत्ता इतना कैसे थक गया? जबकि, तुम तो बिना थके हुए दिख रहे हो।


व्यक्ति कहता है कि जब मैं इसे घुमा रहा था, तब ये कुत्ता दूसरे कुत्ते के पीछे भाग रहा था और फिर वापिस मेरे पास आ जाता था। हम दोनों ने समान दूरी तय की लेकिन फिर भी कुत्ते ने मेरे से ज्यादा दूरी तय करी लेकिन दूसरे कुत्तों के पीछे भागने के कारण ये थक गया।


स्वामी जी कहते हैं ये ही तुम्हारी समस्या का जवाब भी है। तुम आपनी मंजिल के पीछे भागने के बजाय दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो। मंजिल तुम्हारे आस पास ही है।


दोस्तों! हमें अपनी मंजिल की प्राप्ति जब ही होती हैं जब हम एकाग्र होकर अपने लक्ष्य की तरफ चलते हैं। अक्सर हम सब का हाल उस व्यक्ति जैसा ही होता हैं। 


हमें उस व्यक्ति की तरह मेहनत तो जरूर करनी चाहिए लेकिन हमें अपनी मंजिल एक ही रखनी चाहिए।


 दूसरे लोग क्या कर रहे हैं, मेरको भी वो करना है ऐसी चीजों से हमें खुद को दूर रखना चाहिए। सफलता की तैयारी हमें इतनी खामोशी से करनी चाहिए कि बाद में हमारी सफलता ही शोर मचा दे।


स्वामी विवेकानंद का प्रेरक प्रसंग 

(Watch in vidoe format)




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