12 साल की छोटी सी उम्र में जब बच्चें अपने दोस्तों के साथ खेला करते हैं, उस समय एक बच्चा देश के लिए अपनी जान से खेल गया।


शिरीष कुमार मेहता

(Shirish Kumar Mehta)


1942 में जब महात्मा गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ों के आह्वान पर पूरे देश में पदयात्राओ द्वारा विरोध और आंदोलन किया जा रहा था, उसी दौरान गुजरात के किसी स्कूल की आठवीं आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला 12 साल का छोटा सा बच्चा भी पूरे जोर से पदयात्रा में भाग ले रहा था।


भारत माता की जय के नारों के साथ पदयात्रा एक गांव से दूसरे गांव की ओर जा रही थी। बीच रास्ते में ही पुलिस ने इस यात्रा को रोक दिया। 


उस समय शिरीष के हाथ में राष्ट्रध्वज था। पुलिस ने पदयात्रा में शामिल लोगों से यात्रा को खत्म करने को कहा लेकिन उस बहादुर बच्चें ने आदेश की अनदेखी कर, भारत माता की जय, वंदे मातरम के नारे लगाना जारी रखा।


इससे अंग्रेज अधिकारी गुस्से में आ गया और गोलीबारी का आदेश दे दिया। पुलिस वालों ने पदयात्रा में मौजूद बच्चियों की ओर बंदूक तानी तो उस शिरीष ने ललकारते हुए कहा गोली मारनी ही है तो मुझे मार। 


उसकी ललकार से बौखलाए पुलिस अधिकारी ने 2 गोलियां दाग दी, जो शिरीष की छाती में लगी और वह गिर गया। 


खिलौनों से खेलने वाली उम्र में महज 12 साल के छोटे से बच्चें ने देश पर अपनी जान कुर्बान कर दी। वह बहादुरी के साथ बिना किसी डर के अंग्रेज पुलिस की बंदूक के सामने खड़ा हो गया। 


देशभक्ति की भावना के आगे उसने अपनी जान की परवाह भी नहीं की और देश के लिए शहीद हो गया।


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