जतिन दास || Freedom Fighter History In Hindi

भारत को आज़ाद हुए 75 वर्ष हो गए हैं लेकिन इस आजादी को दिलाने में जिन शूरवीर योद्धाओं ने अपने प्राण की परवाह भी नहीं करी, उनको हम आज जानते तक नहीं। आइए उनके योगदान को जानें और अपने भीतर देशभक्ति की भावना को आत्मसात करने का प्रयास करें।


जतिन दास || Jatin Das History In Hindi


कोलकाता के एक साधारण बंगाली परिवार में जन्में जतिंद्रनाथ दास महज 16 साल की उम्र में ही देश की आजादी के आंदोलन में कूद गए थे। इन्हें जतिन दास के नाम से भी जाना जाता है।


16 साल की उम्र! वह उम्र जब बच्चें अपने और अपने दोस्तों के बारे में सोचते हैं और अपने शौक पूरे करने की कोशिश करते हैं, उस नन्ही-सी उम्र में जतिंद्र ने देश के लोगों के बारे में सोचा।


उन्होंने लाहौर असेंबली में बम फेंका, जिसमें कई ब्रिटिश अधिकारी मारे गए थे। इसके बाद पुलिस ने उनके साथियों को पकड़ने के लिए गतिविधियां तेज कर दी और उन्हें पकड़ लिया गया।


उन दिनों जेल में भारतीय राजनैतिक कैदियों की हालत एकदम खराब थी। जेल में लोगों की जिंदगी नरक बनी हुई थी।


उनके कपड़े महीनों नहीं धोए जाते थे। तमाम गंदगी में खाना बनता और परोसा जाता था इससे धीरे-धीरे भारतीय कैदियों में गुस्सा भरता गया।


जेल में भारतीय कैदियों के साथ हो रहे बुरे दुर्व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल की। 'जीत या फिर मौत' इस अटल प्रण के साथ उनकी क्रांतिकारी भूख हड़ताल शुरू हुई। उनका मानना था कि संघर्ष करते हुए गोली खाकर या फांसी पर झूलकर मरना शायद आसान है क्योंकि उसमें अधिक समय नहीं लगता पर अनशन में व्यक्ति धीरे-धीरे मृत्यु की और आगे बढ़ता है। ऐसे में यदि उसका मनोबल कम हो तो संगठन का मूल उद्देश्य खतरे में पड़ जाता है।


हड़ताल तोड़ने के लिए जेल अधिकारी स्वादिष्ट भोजन, मिठाई और दूध आदि इन क्रांतिकारियों को देने लगे। सब क्रांतिकारी ये सामान फेंक देते थे, पर जतिंद्र कमरे में रखे होने पर भी खाने को छूना तो दूर देखते तक न थे।


जेल अधिकारियों ने जबरन अनशन तुड़वाने का निश्चय किया। वे बंदियों के साथ हाथ पैर पकड़कर, नाक में रबड़ की नली घुसेड़कर पेट में दूध डाल देते थे।


जितेंद्र के साथ ऐसा किया गया तो वे जोर-जोर से खांसने लगे। इससे दूध उनके फेफड़ों में चला गया और उनकी हालत बहुत बिगड़ गई। जेल प्रशासन ने उनके छोटे भाई किरणचंद्र दास को उनकी देखरेख के लिए बुला लिया पर जतिंद्रनाथ दास ने उसे इसी शर्त पर अपने साथ रहने की अनुमति दी कि वह उनके संकल्प के बीच नहीं आएगा।


इतना ही नहीं, यदि उनकी बेहोशी की अवस्था में जेल अधिकारी कोई खाना, दवाई या इंजेक्शन देना चाहे, तो वह ऐसा नहीं होने देगा।


हड़ताल के 63वें दिन भी उनके चेहरे पर एक अलग ही तेज था। जतिंद्र ने इस दुनिया से विदा ले ली। सिर्फ 24 साल की उम्र में भारत मां का यह सच्चा सपूत अपने देश के लिए कुर्बान हो गया। यह था देश के लिए सच्चा जज़ और प्यार। न उम्र देखी, न सेहत। देखा तो केवल अपना देश!


भारत माता की जय! वंदे मातरम ! जय हिन्द


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